राजस्थान में लंपी का खतरा बढ़ा, 5 जिलों में केस की सूचना; गो सेवा आयोग ने जारी की एडवाइजरी

12 Sep 2026 BIKANER
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राजस्थान में लंपी का खतरा बढ़ा, 5 जिलों में केस की सूचना; गो सेवा आयोग ने जारी की एडवाइजरी

बीकानेर। राजस्थान के पूर्वी हिस्से के भरतपुर, डीग, अलवर, धौलपुर और दौसा जिलों में गौवंश में लंपी स्किन डिजीज (LSD) फैलने की सूचनाएं सामने आई हैं। इसके बाद राजस्थान गो सेवा आयोग ने राज्यभर की गोशालाओं और पशुपालकों के लिए एडवाइजरी जारी करते हुए बीमारी की रोकथाम के लिए जरूरी सावधानियां बरतने के निर्देश दिए हैं।

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क्या है लंपी स्किन डिजीज?

राजस्थान गो सेवा आयोग की सचिव डॉ. अनिता अग्रवाल के अनुसार लंपी स्किन डिजीज एक विषाणु जनित संक्रामक रोग है, जो मुख्य रूप से गौवंश को प्रभावित करता है। गर्म और नमी वाले मौसम में यह रोग मच्छरों, मक्खियों और चीचड़ों के अलावा दूषित पानी, लार और चारे के माध्यम से तेजी से फैल सकता है।

लंपी रोग के मुख्य लक्षण

एडवाइजरी के अनुसार संक्रमित पशु में तेज बुखार से लेकर त्वचा पर गांठें बनने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:

  • 104 से 106 डिग्री तक तेज बुखार।
  • त्वचा पर मोटी-मोटी गांठें बनना।
  • पशु का चारा नहीं खाना।
  • अत्यधिक कमजोरी आना।
  • दुधारू पशुओं में दूध का सूखना या उत्पादन में भारी कमी होना।

मच्छर-मक्खियों से बचाव जरूरी

गो सेवा आयोग ने बाहरी परजीवियों पर नियंत्रण के लिए पशु चिकित्सक की सलाह से साईपरमैथिन, पलूमैथिन या एमिट्राज का छिड़काव करने तथा आइवरमैक्टिन के उपयोग की सलाह दी है। गोवंश को सुबह थोड़ी देर से गोशाला से बाहर निकालने और शाम को थोड़ा पहले गोशाला में बांधने की सलाह दी गई है, ताकि मच्छरों के प्रकोप से बचाया जा सके।

एडवाइजरी में कहा गया है कि गोवंश को 24 घंटे खुले में नहीं रखना चाहिए। गोशाला के आसपास उगी खरपतवार को काटकर साफ रखना चाहिए, ताकि वहां मच्छरों के पनपने की संभावना कम हो।

गोशाला में सफाई पर विशेष जोर

गोशाला में नियमित सफाई रखने और गोबर को समय-समय पर बाहर निकालने के निर्देश दिए गए हैं। गोबर पर मक्खियां पनपती हैं, इसलिए खाद के लिए बनाए जाने वाले गोबर के ढेर को गोशाला से दूर रखने और उसके आसपास ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

गोशाला की नालियों को साफ रखने तथा सप्ताह में दो बार ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव करने को कहा गया है। शाम के समय गोशाला के बाहर नीम के पत्तों का धुआं करने की भी सलाह दी गई है।

गोशाला को कीटाणुरहित करने के निर्देश

एडवाइजरी के अनुसार गोशाला को खाली कराकर कीटनाशक दवा का छिड़काव किया जाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर साइपरमैथिन 3 मिलीलीटर प्रति एक लीटर पानी के घोल का उपयोग बाहरी परजीवियों पर नियंत्रण के लिए किया जा सकता है। दीवारों पर चूने की पुताई, खिड़कियों पर जाली और कच्चे फर्श पर चूने का छिड़काव करने की सलाह दी गई है। पक्के फर्श की सफाई पोटेशियम परमैग्नेट के घोल से करने को कहा गया है।

लंपी का निश्चित इलाज नहीं, बचाव सबसे जरूरी

गो सेवा आयोग के अनुसार लंपी स्किन डिजीज विषाणु जनित रोग है और इसका कोई निश्चित उपचार उपलब्ध नहीं है। औषधियां एक स्तर तक ही प्रभावी हो सकती हैं। ऐसे में बीमारी के नियंत्रण और रोकथाम के लिए जैव सुरक्षा, साफ-सफाई और संक्रमण रोकने के उपायों को गंभीरता से अपनाना जरूरी है।

बीमार पशु को तुरंत अलग करें

पशु में लंपी के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर उसे स्वस्थ पशुओं से तुरंत अलग करने की सलाह दी गई है। बीमार गोवंश को खुले में चरने के लिए नहीं छोड़ना चाहिए और इसकी सूचना नजदीकी पशु चिकित्सालय को देनी चाहिए, ताकि समय पर चिकित्सकीय देखभाल शुरू की जा सके।

स्वस्थ पशुओं को चारा-पानी देने के बाद ही बीमार पशु को चारा देने और बीमार पशु के बचे हुए चारे को नष्ट करने की सलाह दी गई है। गोशाला में दैनिक काम करते समय पहले स्वस्थ पशुओं की देखभाल और उसके बाद बीमार पशु की देखभाल करने को कहा गया है।

संक्रमित गोशाला में लोगों की आवाजाही सीमित करें

संक्रमित गोशाला में अन्य लोगों की आवाजाही सीमित रखने के निर्देश दिए गए हैं। गोशाला को कीटाणुरहित करने के लिए सोडियम हाइपोक्लोराइड के 2 से 3 प्रतिशत घोल का छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

मृत पशु के निस्तारण के भी निर्देश

लंपी से मृत गोवंश के संपर्क में आई वस्तुओं और स्थानों को लाल दवा तथा फिनाइल आदि से कीटाणुरहित करने को कहा गया है। मृत गोवंश को करीब 1.5 मीटर गहरे गड्ढे में चूने या नमक के साथ दबाने की सलाह दी गई है। रोगग्रस्त क्षेत्र में गोवंश की आवाजाही रोकने के निर्देश भी दिए गए हैं।

सभी गोशालाओं को एडवाइजरी की पालना के निर्देश

राजस्थान गो सेवा आयोग ने जिले के सभी पशु चिकित्सा अधिकारियों तथा गोशालाओं के अध्यक्षों और मंत्रियों को एडवाइजरी की अक्षरशः पालना सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। बीमारी के प्रसार को रोकने के लिए संक्रमित पशुओं को अलग रखना, साफ-सफाई बनाए रखना और पशु चिकित्सकों से समय पर संपर्क करना महत्वपूर्ण बताया गया है।

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