बीकानेर निकाय चुनाव में बगावत का बिगुल! इन 23 वार्डों में बागी बिगाड़ेंगे कांग्रेस-भाजपा का खेल
बीकानेर। नगर निकाय चुनाव में टिकट वितरण के बाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही दलों में बगावत खुलकर सामने आ गई है। कई वार्डों में लंबे समय से सक्रिय दावेदारों के टिकट काटे जाने के बाद नाराज नेता निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतर गए हैं। नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही अब बीकानेर की चुनावी सियासत में असली घमासान शुरू हो गया है।
टिकट से वंचित कई प्रभावशाली दावेदारों ने पार्टी से किनारा कर निर्दलीय के तौर पर ताल ठोक दी है। ऐसे में कई वार्डों में कांग्रेस और भाजपा के बीच होने वाला सीधा मुकाबला अब त्रिकोणीय या बहुकोणीय होता दिखाई दे रहा है। बागियों के मैदान में डटे रहने की स्थिति में दोनों प्रमुख दलों के वोट बैंक में सेंध लग सकती है।
कई वार्डों का परिणाम प्रभावित कर सकते हैं बागी
नामांकन के बाद कई वार्डों में चुनावी मुकाबला केवल कांग्रेस और भाजपा के बीच नहीं रह गया है। मजबूत जनाधार वाले बागी प्रत्याशी अगर मैदान में टिके रहते हैं तो वे दोनों प्रमुख दलों के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं। खासकर उन वार्डों में जहां पिछले चुनावों में जीत-हार का अंतर कम रहा है, वहां बागी उम्मीदवार निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
यही वजह है कि अब दोनों दलों के सामने प्रत्याशियों को चुनाव जिताने के साथ-साथ नाराज दावेदारों को साधने की चुनौती भी है। पार्टी नेतृत्व निर्दलीय पर्चा दाखिल कर चुके नेताओं को नाम वापस लेने के लिए मनाने और उनके समर्थकों को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश करेगा।
नए चेहरों पर दांव, पुराने समीकरणों की परीक्षा
कांग्रेस और भाजपा दोनों ने इस बार कई वार्डों में पुराने चेहरों की जगह युवा और नए प्रत्याशियों पर दांव लगाया है। कई उम्मीदवार पहली बार नगर निकाय चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। पार्टी नेतृत्व का उद्देश्य नए चेहरों के जरिए बदलाव और नई उम्मीद का संदेश देना है।
हालांकि, चुनावी मैदान में केवल पार्टी का टिकट ही जीत की गारंटी नहीं होता। उम्मीदवार का व्यक्तिगत जनसंपर्क, स्थानीय पकड़, समर्थकों का नेटवर्क और पिछले चुनावों का अनुभव भी अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में टिकट कटने से नाराज पुराने चेहरे पार्टी के लिए चुनौती बन सकते हैं।
इन बागियों ने भी ठोकी ताल
बागी उम्मीदवारों में कई निवर्तमान पार्षद और पूर्व पार्षद शामिल बताए जा रहे हैं। इनमें भाजपा से प्रतीक स्वामी, विकास सियाग, प्रमोद सिंह शेखावत और विजय बाफना का नाम सामने आया है। वहीं कांग्रेस से प्रफुल्ल हटीला, वसीम फिरोज, शिवशंकर बिस्सा और महेन्द्र बडगुजर चुनाव मैदान में हैं।
इसके अलावा निर्दलीय रमजान कच्छावा और पार्षद प्रतिनिधि वसीम खिलजी भी चुनावी मैदान में हैं। वर्ष 2019 से पहले पार्षद रह चुके दिनेश उपाध्याय, भगवती प्रसाद गौड़, गुड्डी देवी, दीन मो, शहाबुद्दीन भुट्टो और मोहम्मद ताहिर भी चुनाव लड़ रहे हैं। इनमें कई उम्मीदवार टिकट कटने के बाद नाराज होकर चुनाव मैदान में उतरे हैं।
इन 23 वार्डों में बागियों का असर ज्यादा
आपणी आवाज की टीम द्वारा किए गए वार्डवार सर्वे के अनुसार जिन वार्डों में पार्टी के बागी और मजबूत निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में हैं, वहां कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए चुनौती ज्यादा दिखाई दे रही है।
इन वार्डों में 2, 3, 8, 11, 13, 22, 23, 24, 25, 26, 32, 38, 43, 52, 53, 62, 63, 64, 71, 72, 73, 79 और 80 प्रमुख बताए जा रहे हैं। इन सीटों पर निर्दलीय और बागी प्रत्याशी प्रमुख दलों के समीकरण प्रभावित कर सकते हैं।
दो पार्षद एक ही वार्ड में आमने-सामने
चुनाव में सबसे दिलचस्प स्थिति वार्ड संख्या 80 में देखने को मिल रही है, जहां पिछले चुनाव में अलग-अलग वार्डों से जीत दर्ज करने वाले दो चेहरे इस बार एक ही वार्ड में आमने-सामने हैं।
बताया जा रहा है कि पिछली बार वार्ड संख्या 79 से निर्दलीय चुनाव जीतने वाले रमजान कच्छावा इस बार वार्ड संख्या 80 से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं। कच्छावा ने निर्दलीय चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस को समर्थन दिया था और इस बार पार्टी से टिकट की मांग की थी, लेकिन टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया।
वहीं वार्ड संख्या 80 से पिछली बार कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज करने वाले वसीम फिरोज भी इस बार टिकट कटने के बाद आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतर गए हैं। ऐसे में वार्ड 80 का मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है।
अब डैमेज कंट्रोल की बारी
नामांकन के बाद कांग्रेस और भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब बागियों को साधने की है। अगर पार्टी के नाराज दावेदार मैदान में डटे रहते हैं तो इसका सीधा असर अधिकृत प्रत्याशियों के वोटों पर पड़ सकता है।
आने वाले दिनों में दोनों दलों का फोकस डैमेज कंट्रोल पर रहेगा। कौन सा दल अपने बागियों को मनाने में सफल रहता है और कौन से बागी चुनाव तक मैदान में टिके रहते हैं, इसका असर कई वार्डों के चुनाव परिणाम पर पड़ सकता है।





