महिला सरपंचों के नाम पर विज्ञापनों में प्रतिनिधि आगे, महिला आरक्षण की मंशा पर सवाल
बीकानेर | Aapni Awaj
एक ओर महिला आरक्षण के जरिए महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर बीकानेर में पंचायत चुनावों के बाद दीपावली पर जारी कुछ विज्ञापनों में निर्वाचित महिला सरपंचों की तस्वीरें गायब नजर आ रही हैं। कुछ विज्ञापनों में महिला सरपंच की फोटो के साथ उनके पति, परिवार के सदस्य या प्रतिनिधि की तस्वीर भी प्रमुखता से दिखाई दे रही है। इस स्थिति ने महिला जनप्रतिनिधियों की वास्तविक भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
पंचायत चुनावों में महिलाओं को आरक्षण देकर गांव की सरकार का मुखिया बनाने का उद्देश्य यही है कि महिलाएं स्वयं निर्णय लेने में सक्षम बनें और लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें। लेकिन विज्ञापनों में महिला सरपंचों की भूमिका सीमित नजर आने पर इस उद्देश्य को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
विज्ञापनों में महिला सरपंचों की तस्वीर को लेकर सवाल
दीपावली के अवसर पर जारी कुछ विज्ञापनों में कहीं महिला सरपंच की फोटो पूरी तरह गायब नजर आई, तो कहीं उनकी तस्वीर के साथ पुरुष प्रतिनिधि की फोटो भी प्रमुखता से दिखाई दी। हालांकि, किसी विज्ञापन में प्रतिनिधि की तस्वीर होना अपने आप में नियमों का उल्लंघन साबित नहीं करता।
लेकिन यदि निर्वाचित महिला सरपंच को लगातार पीछे रखकर पुरुष प्रतिनिधि को ही पंचायत का वास्तविक मुखिया प्रस्तुत किया जा रहा है, तो यह स्थिति महिला सशक्तिकरण और प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल जरूर उठाती है।
महिला आरक्षण का उद्देश्य स्वतंत्र नेतृत्व
महिला आरक्षण का मकसद केवल पदों पर महिलाओं की नियुक्ति या चुनाव तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका देना और उन्हें स्वतंत्र रूप से नेतृत्व करने का अवसर उपलब्ध कराना भी है।
ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि निर्वाचित महिला सरपंचों को पंचायतों में स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिल रहा है या नहीं। पंचायत के नाम पर परिवार के सदस्य अथवा प्रतिनिधि किस भूमिका में काम कर रहे हैं, इस पर भी स्पष्टता जरूरी है।
पंचायत राज विभाग और प्रशासन की भूमिका अहम
इस पूरे मामले में पंचायत राज विभाग और संबंधित प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रशासन को यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों की भूमिका प्रभावी और स्वतंत्र बनी रहे।
महिला सरपंचों के नाम पर उनके परिवार के सदस्य या प्रतिनिधि किस हैसियत से पंचायत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? क्या महिला जनप्रतिनिधियों को निर्णय लेने और अपने दायित्व निभाने की पूरी स्वतंत्रता मिल रही है? इन सवालों पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।







