बीकानेर। राजस्थान के राजकीय विद्यालयों में विद्यार्थियों की सुरक्षा, निजता और गरिमा को लेकर माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने नए निर्देश जारी किए हैं। अब किसी भी यूट्यूबर, ब्लॉगर, पत्रकार अथवा अन्य बाहरी व्यक्ति को विद्यालय परिसर में प्रवेश करने के साथ ही फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, ऑडियो रिकॉर्डिंग, इंटरव्यू या लाइव स्ट्रीमिंग के लिए संस्था प्रधान की पूर्व लिखित अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
बिना अनुमति स्कूल में प्रवेश नहीं
निदेशक माध्यमिक शिक्षा राजस्थान, बीकानेर ललित कुमार की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा और निजता को ध्यान में रखते हुए बाहरी व्यक्तियों की गतिविधियों को नियंत्रित किया जाना जरूरी है।
आदेश के अनुसार किसी भी बाहरी व्यक्ति को संस्था प्रधान की अनुमति के बिना विद्यालय परिसर में प्रवेश नहीं दिया जाएगा। विद्यालय में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को पहले विजिटर रजिस्टर में अपनी जानकारी दर्ज करनी होगी।
कक्षा और अन्य स्थानों पर जाने के लिए भी नियम
नए निर्देशों के तहत आगंतुकों को कक्षा-कक्ष, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, छात्रावास, खेल मैदान, शौचालय अथवा विद्यार्थियों की गतिविधियों वाले क्षेत्रों में बिना अधिकृत अधिकारी की मौजूदगी के जाने की अनुमति नहीं होगी।
फोटो-वीडियो और इंटरव्यू के लिए भी लिखित अनुमति
विद्यालय परिसर में विद्यार्थियों, शिक्षकों अथवा विद्यालय की गतिविधियों की फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू, ऑडियो रिकॉर्डिंग और लाइव स्ट्रीमिंग संस्था प्रधान की पूर्व लिखित अनुमति के बिना नहीं की जा सकेगी।
विद्यालय प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि विद्यार्थियों की तस्वीरें, वीडियो या व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक करते समय उनकी सुरक्षा, गरिमा और निजता प्रभावित नहीं हो।
बिना अनुमति प्रवेश पर पुलिस को सूचना
विभागीय आदेश में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति बिना अनुमति विद्यालय में प्रवेश करता है, परिसर छोड़ने से इनकार करता है, अनधिकृत फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी करता है अथवा विद्यालय के काम में बाधा डालता है तो संस्था प्रधान तत्काल स्थानीय पुलिस और जिला शिक्षा अधिकारी को सूचना देंगे।
ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता, पॉक्सो अधिनियम, किशोर न्याय अधिनियम, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम सहित अन्य संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
आदेश को लेकर उठ रहे सवाल
शिक्षा विभाग के आदेश का उद्देश्य विद्यार्थियों की सुरक्षा और निजता बताया गया है, लेकिन इस आदेश को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं। आलोचकों का कहना है कि विद्यालयों में विद्यार्थियों की समस्याओं, जर्जर भवनों, साफ-सफाई, मिड-डे मील और अन्य व्यवस्थाओं से जुड़ी वास्तविक स्थिति सामने लाने में मीडिया और आमजन की भूमिका महत्वपूर्ण है।
ऐसे में सवाल उठाया जा रहा है कि यदि विद्यालय परिसर में प्रवेश और फोटो-वीडियो के लिए पहले से लिखित अनुमति अनिवार्य होगी तो स्वतंत्र रिपोर्टिंग किस तरह हो सकेगी।
‘स्कूल की कमियां सामने कैसे आएंगी?’
आदेश को लेकर उठ रही आपत्तियों में यह सवाल भी शामिल है कि यदि किसी विद्यालय की इमारत जर्जर है, बच्चे फर्श पर बैठकर पढ़ रहे हैं या स्कूल में साफ-सफाई और अन्य व्यवस्थाओं में कमी है, तो इन समस्याओं की मौके पर जाकर रिपोर्टिंग कैसे होगी।
आलोचकों का तर्क है कि बच्चों की निजता और सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही सरकारी विद्यालयों में पारदर्शिता और जवाबदेही भी बनी रहनी चाहिए।
क्या हर खबर के लिए लेनी होगी अनुमति?
जानकारों का कहना है कि यदि ऐसे नियमों का दायरा बढ़ता है तो भविष्य में अन्य सरकारी विभागों में भी मीडिया कवरेज के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था लागू होने का सवाल उठ सकता है। इससे स्वतंत्र पत्रकारिता और सरकारी संस्थानों की जवाबदेही को लेकर बहस तेज हो सकती है।
फिलहाल शिक्षा विभाग ने सभी पर्यवेक्षण अधिकारियों और संस्था प्रधानों को जारी निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा और निजता से जुड़े नियमों का पालन जरूरी है। वहीं, सरकारी संस्थानों की व्यवस्थाओं और जनहित से जुड़े मुद्दों पर पारदर्शिता एवं जवाबदेही बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।





