AAPNI AWAJ | बीकानेर
फर्जी मुख्तियारनामे से करोड़ों की जमीन हड़पने का आरोप: 12 साल पुराने मामले में फिर होगी जांच, कोर्ट ने दिए एफएसएल के आदेश
बीकानेर। फर्जी मुख्तियारनामे के जरिए करोड़ों रुपये की कृषि भूमि अपने नाम करवाने के आरोप से जुड़ा 12 साल पुराना मामला एक बार फिर जांच के दायरे में आ गया है। न्यायालय अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-02, बीकानेर ने मामले में अग्रिम अनुसंधान के आदेश दिए हैं। साथ ही विवादित मुख्तियारनामे पर अंकित हस्ताक्षरों की एफएसएल जांच करवाने के निर्देश भी दिए गए हैं।
करोड़ों की कृषि भूमि को लेकर लगाया फर्जीवाड़े का आरोप
मामले में युद्धवीर सिंह और संजय सिंह ने सदर थाने में समीक्षा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के मालिक लालचंद गौड़ और उसके कर्मचारी नेमाराम के खिलाफ जमीन से जुड़े फर्जीवाड़े का आरोप लगाया था। परिवादियों के अनुसार ग्राम उदयरामसर और जैसलमेर रोड के पास स्थित ग्राम सालासर क्षेत्र में उनकी करोड़ों रुपये मूल्य की कृषि भूमियां हैं।
आरोप है कि नेमाराम के नाम से फर्जी मुख्तियारनामा आम तैयार कराकर जमीनें अपने नाम करवा ली गईं और इनमें से कुछ कृषि भूमि आगे भी बेच दी गई। परिवादियों का कहना है कि उन्होंने कभी भी नेमाराम को मुख्तयार आम नियुक्त नहीं किया था।
फर्जी हस्ताक्षर करने का भी आरोप
परिवादी के अनुसार जिस मुख्तियारनामा आम के आधार पर भूमि का विक्रय किया गया, उस पर संजय सिंह ने कभी हस्ताक्षर नहीं किए। आरोप है कि फर्जी हस्ताक्षरों के जरिए पूरे मामले को अंजाम दिया गया।
हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता जांचे बिना लगी थी एफआर
परिवादी पक्ष का आरोप है कि पुलिस जांच के दौरान विवादित हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता की एफएसएल जांच नहीं करवाई गई और बिना वैज्ञानिक जांच के मामले में एफआर लगा दी गई। पुलिस जांच से असंतुष्ट होकर परिवादी ने न्यायालय का रुख किया।
एडवोकेट अनिल सोनी के माध्यम से न्यायालय में अर्जी प्रस्तुत कर मुख्तियारनामा आम पर अंकित संजय सिंह के हस्ताक्षरों की एफएसएल जांच और मामले के अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं पर गहन जांच की मांग की गई।
कोर्ट ने दिए पुनः अनुसंधान के आदेश
एडवोकेट अनिल सोनी के अनुसार पीठासीन अधिकारी माधवी मोदी ने मामले की सुनवाई करते हुए अग्रिम अनुसंधान के आदेश दिए हैं। न्यायालय ने मुख्तियारनामा आम पर अंकित विवादित हस्ताक्षरों की एफएसएल रिपोर्ट करवाने के साथ अन्य बिंदुओं पर भी गंभीरता से जांच करने के निर्देश दिए हैं।
सोनी के अनुसार न्यायालय ने टिप्पणी की कि कूटरचना से जुड़े मामलों में विवादित दस्तावेजों की एफएसएल जांच करवाए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है। बताया गया कि यह मामला वर्ष 2014 से जुड़ा है, जबकि वर्ष 2022 में इस संबंध में मुकदमा दर्ज हुआ था।






