बीकानेर निगम के 47.60 लाख के केबिनों पर लगा ताला, 2 साल से बंद पड़े सफाई कर्मचारियों के कार्यालय

08 Jun 2026 BIKANER
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जनता की गाढ़ी कमाई पर निगम का 'ताला': 47.60 लाख रुपए से बने केबिन दो साल से बंद, सफाई कर्मचारियों को नहीं मिला लाभ

बीकानेर: बीकानेर नगर निगम में जनता के टैक्स के पैसों के उपयोग को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। शहर की सफाई व्यवस्था को बेहतर बनाने और सफाई कर्मचारियों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से करीब 47.60 लाख रुपए की लागत से बनाए गए लोहे के केबिन पिछले दो वर्षों से बंद पड़े हैं। स्थिति यह है कि जिन कार्यालयों को सफाई कर्मचारियों की सुविधा के लिए बनाया गया था, वे आज खुद उपेक्षा का शिकार होकर जंग खा रहे हैं।

80 वार्डों के लिए बनाई गई थी योजना

नगर निगम द्वारा ई-निविदा सूचना संख्या 38/2024-25 के तहत यह योजना शुरू की गई थी। योजना का उद्देश्य शहर के सभी 80 वार्डों में सफाई कर्मचारियों और जमादारों के लिए छोटे कार्यालय उपलब्ध कराना था, जहां वे बैठ सकें, हाजिरी लगा सकें और सफाई उपकरण सुरक्षित रख सकें।

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तत्कालीन महापौर ने सफाई कर्मचारियों की मांग को देखते हुए बजट में इस योजना का प्रावधान करवाया था। इससे कर्मचारियों को सुबह दूर-दराज के कार्यालयों में जाने की आवश्यकता नहीं रहती और वे मौसम की मार से भी बच सकते थे।

करीब 50 वार्डों में बने केबिन, लेकिन नहीं हुआ उपयोग

नगर निगम द्वारा करीब 50 वार्डों में लोहे के केबिन स्थापित कर दिए गए। हालांकि निर्माण पूरा होने के बाद भी इनका संचालन शुरू नहीं किया गया। दो साल बीत जाने के बावजूद अधिकांश केबिनों के ताले तक नहीं खुले हैं।

वार्ड 53 में गजनेर रोड स्थित महारानी कॉलेज हॉस्टल के सामने बना केबिन इसका उदाहरण है, जो देखने से ही प्रतीत होता है कि इसे कभी उपयोग में नहीं लिया गया। वहीं वार्ड 52 में सफाई कर्मचारियों को आज भी अपने झाड़ू और अन्य उपकरण निगम की दीवार के पास बने छोटे स्थानों में रखने पड़ रहे हैं।

सफाई कर्मचारी आज भी परेशान

सफाई कर्मचारियों का कहना है कि केबिन बनने के बावजूद उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। उन्हें आज भी अपने झाड़ू, तसले और अन्य उपकरण सड़क किनारे, पेड़ों के पीछे या खुले स्थानों पर रखने पड़ते हैं।

बरसात के मौसम में उपकरण खराब हो जाते हैं, जबकि कई बार चोरी की घटनाएं भी सामने आती हैं। कर्मचारियों का कहना है कि यदि इन केबिनों का उपयोग शुरू हो जाए तो उनकी कार्यक्षमता और सुविधा दोनों में सुधार हो सकता है।

धूप-बारिश में जंग खा रहे लाखों के ढांचे

दो वर्षों से बंद पड़े इन लोहे के केबिनों की हालत लगातार खराब होती जा रही है। धूप, बारिश और रखरखाव के अभाव में कई केबिनों पर जंग लगना शुरू हो गया है। जनता के लाखों रुपए से तैयार किए गए ये ढांचे अब सफेद हाथी साबित होते नजर आ रहे हैं।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि समय रहते इनका उपयोग नहीं किया गया तो भविष्य में इनकी मरम्मत पर भी अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा, जिसका बोझ अंततः जनता पर ही पड़ेगा।

जवाबदेही पर उठे सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि दो साल तक बंद पड़े इन केबिनों की जिम्मेदारी आखिर किसकी है। नगर निगम के अधिकारियों द्वारा न तो इनका नियमित निरीक्षण किया गया और न ही इनके संचालन को लेकर कोई ठोस कदम उठाया गया।

निवर्तमान पार्षदों और स्थानीय लोगों का कहना है कि योजना की अवधारणा बेहद अच्छी थी, लेकिन प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी और लापरवाही के कारण यह धरातल पर सफल नहीं हो सकी।

उच्च स्तरीय जांच की मांग

नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि करोड़ों नहीं तो लाखों रुपए की इस योजना का लाभ आम कर्मचारियों तक क्यों नहीं पहुंच पाया।

साथ ही मांग की जा रही है कि सभी बंद पड़े केबिनों को तत्काल शुरू किया जाए और संबंधित वार्डों के जमादारों एवं अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए, ताकि जनता के धन का सही उपयोग सुनिश्चित हो सके।

फिलहाल सवाल यही है कि जब सफाई कर्मचारियों की सुविधा के लिए बनाए गए कार्यालय खुद ताले में बंद हैं, तो आखिर जनता के पैसे से बनी इस योजना का वास्तविक लाभ किसे मिला?

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