‘गौचर और ओरण जमीन के टुकड़े नहीं…’ देवी सिंह भाटी ने सरकार से क्यों की ये बड़ी मांग?

12 Aug 2026 BIKANER
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गौचर-ओरण की जमीन पर बड़ा बयान! देवी सिंह भाटी ने सरकार से की ठोस कार्रवाई की मांग

बीकानेर। पूर्व सिंचाई मंत्री एवं वरिष्ठ नेता देवी सिंह भाटी ने राजस्थान में गौचर, चारागाह, ओरण एवं अन्य सार्वजनिक उपयोग की भूमि के संरक्षण को लेकर राज्य सरकार से ठोस कार्रवाई की मांग की है। भाटी ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, मुख्य सचिव, राजस्व एवं उपनिवेशन मंत्री, प्रमुख शासन सचिव राजस्व एवं उपनिवेशन विभाग तथा अध्यक्ष, राजस्व मंडल को पत्र लिखकर गौचर एवं चारागाह भूमि के संरक्षण को लेकर अपनी चिंता जाहिर की है।

गौचर भूमि के संरक्षण को लेकर सरकार से कार्रवाई की मांग

देवी सिंह भाटी ने अपने पत्र में कहा कि राजस्थान में गौचर एवं चारागाह भूमि केवल पशुओं के चरने का स्थान नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुपालन, पर्यावरणीय संतुलन और वन्यजीव संरक्षण से सीधे जुड़ी हुई है। लगातार कम होती चारागाह भूमि के कारण ऊंट, भेड़, बकरी सहित अन्य पशुधन के लिए प्राकृतिक चराई क्षेत्र सीमित होते जा रहे हैं।

भाटी ने कहा कि इसका सीधा असर पशुपालकों की आजीविका, पशुधन और पर्यावरणीय संतुलन पर पड़ रहा है। ऐसे में इन पारंपरिक सार्वजनिक एवं पर्यावरणीय महत्व वाली जमीनों का संरक्षण बेहद जरूरी है।

2021 और 2025 के आदेशों पर उठाए सवाल

पूर्व मंत्री ने विगत कांग्रेस सरकार द्वारा 23 सितंबर 2021 को जारी आदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 103(ं)(पअ) एवं धारा 92 में जनहित के कार्यों के लिए गोचर भूमि के उपयोग अथवा अवाप्ति से संबंधित प्रावधानों की गलत व्याख्या की गई थी।

उन्होंने स्वायत्त शासन विभाग द्वारा 17 अप्रैल 2025 को जारी आदेश तथा 1 सितंबर 2025 को जारी स्पष्टीकरण आदेश का भी उल्लेख किया और इन आदेशों को गौचर एवं चारागाह भूमि के संरक्षण की दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय बताया। भाटी ने इन आदेशों को विलोपित करने की मांग की है।

गौचर, ओरण और तालाब जैसी जमीनों को सुरक्षित रखने की मांग

देवी सिंह भाटी ने राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956, राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 तथा उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि गौचर, ओरण, तालाब, पायतन, बावड़ी और तलाई जैसी पारंपरिक सार्वजनिक एवं पर्यावरणीय महत्व की भूमि को सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

उन्होंने गुलाब कोठारी बनाम राज्य सरकार प्रकरण में न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्देशों का भी उल्लेख किया और कहा कि प्राकृतिक संसाधनों तथा सार्वजनिक उपयोग की भूमि का संरक्षण आवश्यक है।

विकास कार्यों के लिए वैकल्पिक भूमि के इस्तेमाल की मांग

भाटी ने कहा कि विकास एवं जनहित के कार्यों के लिए यदि भूमि की आवश्यकता हो तो उपलब्ध अराजीराज अथवा निजी भूमि का उपयोग किया जाना चाहिए। आवश्यकता होने पर नियमानुसार भूमि अवाप्ति की जा सकती है, लेकिन सदियों से पशुधन और पर्यावरण के लिए सुरक्षित चली आ रही गौचर भूमि को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।

वन्यजीव और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का भी दिया हवाला

पूर्व सिंचाई मंत्री ने हाल ही में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा वन्य जीव सेवार्थ फाउंडेशन बनाम राजस्थान सरकार प्रकरण में दिए गए निर्णय का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि न्यायालयों की भावना प्राकृतिक संसाधनों, वन्यजीव क्षेत्रों और सार्वजनिक उपयोग की भूमि के संरक्षण की रही है।

भाटी के अनुसार गौचर, चारागाह, ओरण, तालाब, पायतन और बावड़ी जैसी भूमि को विकास के नाम पर समाप्त करने वाली किसी भी व्यवस्था पर गंभीरता से पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का भी किया उल्लेख

देवी सिंह भाटी ने कहा कि प्रदेश के आमजन में गौचर एवं ओरण भूमि के संरक्षण को लेकर व्यापक चिंता है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पर्यावरण संरक्षण एवं जनभागीदारी को लेकर दिए जा रहे संदेश तथा ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे पर्यावरणीय अभियानों का भी उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि पर्यावरण, वन्यजीव, वृक्ष एवं गौवंश सहित समस्त जीव-जगत के संरक्षण के लिए प्राकृतिक एवं सार्वजनिक भूमि को सुरक्षित रखना सामूहिक जिम्मेदारी है।

सरकार से की ये प्रमुख मांगें

पूर्व मंत्री देवी सिंह भाटी ने राज्य सरकार से मांग की है कि 23 सितंबर 2021 को जारी आदेश, स्वायत्त शासन विभाग के 17 अप्रैल 2025 के आदेश तथा 1 सितंबर 2025 के स्पष्टीकरण आदेश की विधि एवं जनहित की दृष्टि से पुनः समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई की जाए।

इसके साथ ही उन्होंने प्रदेशभर में गौचर, चारागाह, ओरण, तालाब, पायतन, बावड़ी एवं तलाई जैसी भूमि का संरक्षण सुनिश्चित करने की मांग की है, ताकि पशुधन, पर्यावरण, वन्यजीव और ग्रामीण जीवन की पारंपरिक व्यवस्था सुरक्षित रह सके।

“गौचर और ओरण केवल जमीन के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि राजस्थान की पशुधन संस्कृति, पर्यावरणीय विरासत और ग्रामीण जीवन की आधारभूमि हैं। इनके संरक्षण से ही आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों और पशुधन की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।”

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