PBM Hospital Bikaner: डिलीवरी के बाद 6 प्रसूताओं की किडनी फेल, 7 दिन बाद बनी जांच कमेटी
बीकानेर: संभाग के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल पीबीएम हॉस्पिटल में डिलीवरी के बाद छह प्रसूताओं की किडनी फेल होने का मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया है। सभी महिलाओं की हालत बिगड़ने के बाद उनका डायलिसिस किया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अस्पताल प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है और दो अलग-अलग जांच समितियों का गठन किया गया है।
जानकारी के अनुसार सिजेरियन डिलीवरी के बाद प्रसूताओं को ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाया गया था। इसके कुछ समय बाद महिलाओं की तबीयत बिगड़ने लगी और धीरे-धीरे उनकी किडनी प्रभावित होने की शिकायत सामने आई। शुरुआती जांच में इंजेक्शन की गुणवत्ता और अस्पताल में संक्रमण दोनों पहलुओं की जांच की जा रही है।
डिलीवरी के बाद अचानक बिगड़ी हालत
अस्पताल सूत्रों के अनुसार सभी महिलाएं डिलीवरी तक सामान्य स्थिति में थीं। लेकिन बच्चे के जन्म के लगभग दो घंटे बाद उनकी तबीयत अचानक खराब होने लगी। पहले अत्यधिक रक्तस्राव की शिकायत हुई और बाद में किडनी प्रभावित होने की जानकारी सामने आई।
हालात बिगड़ने पर सभी महिलाओं को गहन चिकित्सा निगरानी में रखा गया और बाद में डायलिसिस शुरू करना पड़ा। बताया जा रहा है कि सबसे पहले भर्ती हुई प्रीति का अब तक 13 बार डायलिसिस किया जा चुका है, जबकि तारा देवी, शारदा, राहिला और इमरती का तीन-तीन बार डायलिसिस हो चुका है।
ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन पर उठे सवाल
पीबीएम अस्पताल के अधीक्षक डॉ. बी.सी. घीया ने बताया कि सिजेरियन डिलीवरी के दौरान उपयोग किए गए ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की जांच की जा रही है। उन्होंने कहा कि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इंजेक्शन में किसी प्रकार की गड़बड़ी थी, लेकिन इसकी संभावना से पूरी तरह इनकार भी नहीं किया जा सकता।
अस्पताल प्रशासन के अनुसार कोटा मेडिकल कॉलेज में सामने आए समान मामले के बाद एहतियातन ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन बदल दिया गया था और दूसरी कंपनी का इंजेक्शन उपयोग में लिया गया। पुराने इंजेक्शन का उपयोग 3 जून से बंद कर दिया गया था।
बताया जा रहा है कि सरकारी सप्लाई उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में अस्पताल प्रशासन ने बाजार से ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन खरीदे थे। अब यह पता लगाया जा रहा है कि ये इंजेक्शन किस कंपनी के थे और उनकी गुणवत्ता क्या थी।
OT और ICU में मिला संक्रमण
जांच के दौरान यह भी सामने आया है कि जिन ऑपरेशन थिएटर और आईसीयू में इन महिलाओं का इलाज किया गया था, वहां संक्रमण के संकेत मिले हैं। इसके बाद अस्पताल प्रशासन ने संबंधित वार्डों और ऑपरेशन थिएटर में विशेष सफाई, फॉगिंग और संक्रमण नियंत्रण संबंधी कार्यवाही करवाई है।
विशेषज्ञ टीम यह भी जांच कर रही है कि कहीं संक्रमण के कारण महिलाओं की तबीयत तो नहीं बिगड़ी।
7 दिन बाद बनी जांच कमेटी
मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि अस्पताल प्रशासन को 2 जून को ही महिलाओं की स्थिति बिगड़ने की जानकारी मिल गई थी, लेकिन जांच समिति का गठन लगभग सात दिन बाद किया गया। इस बीच छह महिलाओं की किडनी प्रभावित हो चुकी थी और उन्हें डायलिसिस पर रखना पड़ा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) ने भी एसपी मेडिकल कॉलेज प्रशासन से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इसके बाद अस्पताल में लगातार बैठकों का दौर जारी है।
दो अलग-अलग जांच समितियां गठित
अस्पताल प्रशासन ने पूरे मामले की जांच के लिए दो अलग-अलग समितियां बनाई हैं। एक समिति मेडिकल कॉलेज प्राचार्य स्तर पर और दूसरी अस्पताल अधीक्षक स्तर पर गठित की गई है।
इन समितियों में वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ, फिजिशियन, ड्रग कंट्रोलर विभाग के अधिकारी, नर्सिंग स्टाफ प्रभारी और अन्य विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। जांच समिति मरीजों की रिपोर्ट, दवाओं के उपयोग, संक्रमण नियंत्रण प्रक्रिया और उपचार संबंधी सभी पहलुओं की समीक्षा करेगी।
ड्रग कंट्रोलर टीम ने लिए सैंपल
मामले की जांच के लिए ड्रग कंट्रोलर विभाग की टीम भी अस्पताल पहुंची। टीम ने संबंधित इंजेक्शनों के सैंपल लेकर परीक्षण के लिए भेजे हैं। रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि इंजेक्शन की गुणवत्ता में कोई कमी थी या नहीं।
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
लापरवाही मिलने पर होगी कार्रवाई
अधीक्षक डॉ. बी.सी. घीया ने कहा कि फिलहाल डॉक्टरों की किसी प्रकार की लापरवाही सामने नहीं आई है। हालांकि जांच में यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही साबित होती है तो संबंधित कर्मचारियों या अधिकारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
उन्होंने बताया कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जा रही है और सभी संभावित कारणों की पड़ताल की जा रही है।
कोटा मामले से जुड़ रही कड़ियां
गौरतलब है कि कुछ समय पहले कोटा मेडिकल कॉलेज में भी प्रसूताओं की किडनी फेल होने के मामले सामने आए थे। वहां भी ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठे थे। हालांकि दोनों मामलों में अलग-अलग कंपनियों के इंजेक्शन उपयोग किए गए थे, लेकिन समान लक्षण सामने आने के कारण जांच एजेंसियां दोनों मामलों के बीच संभावित संबंधों की भी पड़ताल कर रही हैं।
फिलहाल सभी की निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे इस पूरे मामले की असली वजह सामने आ सकेगी और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय हो सकेगी।




