कागजी साबित हो रहे सेवा शिविर! 51 निकायों में पट्टों का काम शून्य
राजस्थान। प्रदेश के शहरों में पट्टों के वितरण के लिए शुरू किए गए सरकार के सेवा शिविर अब सवालों के घेरे में आ गए हैं। 12 जून से शुरू हुए इन शिविरों में कई नगरीय निकायों में पट्टा वितरण का काम पूरी तरह ठप पड़ा है।
जमीनी स्थिति यह है कि प्रदेश के 51 नगरीय निकायों में पट्टों की प्रगति शून्य रही है। शिविरों में केवल जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र जैसे छोटे काम हो रहे हैं, जबकि मुख्य उद्देश्य यानी लोगों को पट्टे उपलब्ध करवाना पीछे छूट गया है।
पैसे जमा, रसीद मिली लेकिन आज तक नहीं मिला पट्टा
शिविरों में पहुंच रहे लोगों की परेशानी बढ़ती जा रही है। कई लोगों ने पुराने अभियानों के दौरान नियमन शुल्क जमा करवा दिया था और रसीद भी मिल गई थी, लेकिन वर्षों बाद भी पट्टा जारी नहीं हुआ।
कई मामलों में लोगों के मकान से जुड़े मूल दस्तावेज भी निगम कार्यालयों में जमा हैं। अब लोगों को डर है कि कहीं उनके दस्तावेज फंस न जाएं या गायब न हो जाएं।
बीकानेर में भी फाइलों को लेकर उठ चुके हैं सवाल
बीकानेर नगर निगम में पुराने अभियानों की फाइलों को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। इसी कारण कई लोग नए सेवा शिविरों में आवेदन करने से बच रहे हैं।
लोग पुराने गंगाशाही पट्टों को सरेंडर कर धारा 69-A के तहत फ्री होल्ड पट्टा बनवाना चाहते हैं, लेकिन बिना विवाद वाली फाइलें भी महीनों से लंबित हैं।
दस्तावेजों की कमी और विवादित कॉलोनियां बनीं बाधा
धारा 69-A के तहत 31 दिसंबर 2018 से पहले के निवास का प्रमाण नहीं होने पर कई फाइलें अटक रही हैं। पुराने बिजली बिल या इकरारनामे जैसे दस्तावेजों की कमी के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।
वहीं 60 फीट से ज्यादा चौड़ी सड़कों वाली कॉलोनियों और मालिकाना हक से जुड़े विवादों के कारण भी कई आवेदन लंबित हैं।
शिविरों में पसरा सन्नाटा
सरकार ने जिन फाइलों के निस्तारण के लिए शिविर लगाए थे, वहां अब लोगों की कम और इंतजार की स्थिति ज्यादा दिखाई दे रही है। अधिकारियों की धीमी कार्यप्रणाली से जनता में नाराजगी बढ़ रही है।
लोगों की मांग है कि उनके मूल दस्तावेजों की सुरक्षा और समय पर पट्टा जारी करने की स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए, ताकि ये शिविर सिर्फ कागजों तक सीमित न रह जाएं।
इन निकायों में पट्टा वितरण की स्थिति शून्य
बीकानेर मंडल सहित प्रदेश के कई निकायों में अब तक पट्टा वितरण की प्रगति रिपोर्ट शून्य बताई गई है। इनमें बीकानेर, चूरू, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर सहित कई शहर शामिल हैं।
अब सवाल यह है कि जब जनता को राहत देने के लिए लगाए गए शिविरों में ही काम नहीं होगा, तो आमजन को पट्टा कब मिलेगा?




